Hajj (Pilgrimage) – The Fifth Pillar of Islam

हज (حج) इस्लाम का पाँचवाँ स्तंभ और मुसलमानों के लिए सबसे महान इबादतों में से एक है। यह मक्का मुअज़्ज़मा की वह फ़र्ज़ तीर्थयात्रा है जिसे हर बालिग़, तंदुरुस्त और आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमान को अपनी ज़िंदगी में कम से कम एक बार अदा करना लाज़िमी है। Hajj (Pilgrimage) – The Fifth Pillar of Islam

हज का सफ़र रूहानी पाकीज़गी, ईमान की ताज़गी और उम्मत-ए-मुस्लिमाह की एकता का ज़िंदा सबक है। इसके अरकान हर साल इस्लामी माह ज़िलहिज्जा में अदा किए जाते हैं और ये हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम), उनकी अहलिया हाजरा (रज़ियल्लाहु अन्हा) और उनके बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानियों की याद को ताज़ा करते हैं।

Hajj (Pilgrimage) – The Fifth Pillar of Islam

कुरआन से:

“और लोगों में हज का ऐलान कर दो, वे तुम्हारे पास पैदल और हर दुबली ऊँटनी पर आएँगे, जो दूर-दूर के रास्तों से आएँगे।”
(सूरह अल-हज 22:27)

हदीस से:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“जो शख़्स हज करे और उसमें कोई फ़ुह्श (अश्लील) बात या गुनाह न करे, वह उस दिन की तरह पवित्र होकर लौटता है जैसे उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था।”
(सहीह बुख़ारी व मुस्लिम)

हज तब फ़र्ज़ होता है जब ये शर्तें पूरी हों:

  1. मुसलमान – ग़ैर-मुस्लिम पर हज फ़र्ज़ नहीं।
  2. बालिग़ – बुलुग़त की उम्र को पहुँचा हो।
  3. आक़िल – मानसिक रूप से स्वस्थ हो।
  4. माली तौर पर सक्षम – सफ़र और क़याम का ख़र्च क़र्ज़ के बिना उठा सके।
  5. जिस्मानी तौर पर क़ादिर – अरकान अदा करने के लिए सेहतमंद हो।
  1. एहराम – पाकीज़गी की हालत, मख़सूस कपड़ों का पहनना।
  2. तवाफ़ अल-क़ुदूम – मक्का पहुँचने पर काबा शरीफ़ का सात बार चक्कर।
  3. सई – सफ़ा और मरवा पहाड़ियों के बीच चलना, हाजरा (र.अ) की पानी की तलाश की याद।
  4. वुक़ूफ़-ए-अरफ़ात – अरफ़ात के मैदान में ठहरना, हज का सबसे अहम दिन।
  5. मुज़दलिफ़ा – जमारात के लिए कंकड़ इकट्ठा करना।
  6. रमी अल-जमारात – शैतान को पत्थर मारने की सुन्नत अदा करना।
  7. क़ुर्बानी – हज़रत इब्राहीम (अ.स) की कुर्बानी की याद में जानवर ज़बह करना।
  8. तवाफ़ अल-इफ़ादा – अरफ़ात के बाद काबा का तवाफ़।
  9. तवाफ़ अल-वदा – मक्का से रवाना होने से पहले विदाई तवाफ़।
  1. गुनाहों की माफ़ी – नेकनीयत हज पिछले गुनाहों को मिटा देता है।
  2. मुसलमानों की एकता – लाखों लोग बिना नस्ल, भाषा और दर्जे के फ़र्क के जमा होते हैं।
  3. ईमान की मजबूती – अल्लाह से गहरा रिश्ता और अंबिया की याद।
  4. सब्र और इंतेज़ाम – कुर्बानी, शुक्र और अदब का सबक।
  5. जन्नत का रास्ता – हज मबरूर का इनाम सिर्फ़ जन्नत है।
  1. हज तमत्तु – एक ही सफ़र में उमरा और हज दोनों करना।
  2. हज क़िरान – उमरा और हज दोनों बिना एहराम उतारे अदा करना।
  3. हज इफ़राद – सिर्फ़ हज करना, उमरा नहीं।

हज सिर्फ़ एक फ़र्द की रूहानी सफ़र नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मुसलमानों का आलमी इजलास है। यह उम्मत के रिश्ते को मज़बूत करता है, अमन का पैग़ाम फैलाता है और इस्लामी भाईचारे की मिसाल पेश करता है।

हज सिर्फ़ जिस्मानी सफ़र नहीं — बल्कि रूह की पाकीज़गी, अल्लाह के हुक्म की तामील और लाखों मुसलमानों की ख्वाहिश का पूरा होना है। जो सक्षम हो, उसके लिए इसे बेवजह टालना मुनासिब नहीं।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“हज जल्दी कर लो, क्योंकि तुममें से कोई नहीं जानता कि उसके साथ कल क्या होगा।”
(अहमद, अबू दाऊद)

अल्लाह तआला हर मुसलमान को हज की तौफ़ीक़ अता फरमाए और उसे हज मबरूर क़बूल फरमाए। आमीन।

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