Roza (Fasting) – The Fourth Pillar of Islam

रोज़ा (روزہ) जिसे अरबी में सौम (صوم) कहा जाता है, इस्लाम का चौथा स्तम्भ है (Roza (Fasting) – The Fourth Pillar of Islam) और एक अहम इबादत है, जिसे मुसलमान ख़ास तौर पर महीने-ए-रमज़ान में अदा करते हैं। रोज़ा सिर्फ़ भूख-प्यास से रुकना नहीं, बल्कि फ़ज्र से मग़रिब तक खाने, पीने और गुनाहों से बचकर अल्लाह की रज़ा हासिल करने का नाम है।

📖 क़ुरआन का हुक्म:

“ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़ा फ़र्ज़ किया गया है, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ किया गया था, ताकि तुम तक़वा हासिल करो।” (सूरह अल-बक़रह 2:183)

Roza (Fasting) – The Fourth Pillar of Islam

“रोज़ा” फ़ारसी लफ़्ज़ है, जबकि “सौम” अरबी लफ़्ज़ है जो क़ुरआन में आया है। इसका मतलब है – किसी नीयत के साथ एक मुक़र्रर वक़्त के लिए खाने-पीने और कुछ कामों से परहेज़ करना।
असल रोज़ा सिर्फ़ पेट और गले को खाली रखना नहीं, बल्कि झूठ, ग़ीबत, ग़ुस्सा और हर तरह के गुनाह से बचना भी है।

﴾ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿
(सूरह अल-बक़रह 2:183)

हिंदी अनुवाद:
“ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ कर दिए गए, जैसे तुमसे पहले वालों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम तक़्वा हासिल करो।”

फ़र्ज़ रोज़े महीने-ए-रमज़ान में रखे जाते हैं, जो इस्लामी चाँद के हिसाब से 9वां महीना है। रमज़ान की शुरुआत चाँद दिखने से होती है और यह 29 या 30 दिन का होता है।
इसके अलावा, सुन्नत और नफ़्ल रोज़े भी रखे जाते हैं जैसे:

  • रोज़ा फज्र (सुबह की अज़ान) से मग़रिब (शाम की अज़ान) तक रहता है।
  • रमज़ान के पूरे महीने रोज़े रखना फ़र्ज़ है।
  • अय्याम अल-बीद (इस्लामी महीने की 13, 14, 15 तारीख़)
  • आशूरा का रोज़ा (10 मुहर्रम)
  • शव्वाल के 6 रोज़े

रोज़ा हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है जो:

  • बालिग़ (व्यस्क) और अक़्लमंद हो
  • तंदुरुस्त हो
  • मुसाफ़िर न हो
  • औरत हो तो हायज़ (माहवारी) या निफ़ास (जच्चगी) से पाक हो
  1. तक़्वा (Fear of Allah) पैदा होना
  2. सब्र और आत्म-नियंत्रण
  3. गरीबों के हालात का एहसास
  4. स्वास्थ्य लाभ – डिटॉक्स और पाचन तंत्र को आराम
  5. रूहानी सुकून – दिल में शांति और अल्लाह से क़रीबी
  1. खाना या पीना (जान-बूझकर)
  2. वैवाहिक संबंध बनाना
  3. जान-बूझकर उल्टी करना
  4. हराम कामों में लिप्त होना (गाली-ग़लौच, झूठ, ग़ीबत)

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“रोज़ा एक ढाल है, जब तक उसे तोड़ा न जाए।”
(सहीह बुखारी, हदीस: 1904)

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जो शख़्स ईमान और सवाब की नीयत से रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।” (बुख़ारी व मुस्लिम)

सौम (रोज़ा) सिर्फ़ भूख और प्यास सहने का नाम नहीं, बल्कि यह आत्मा की ताज़गी, ईमान की मजबूती, रूहानी सफ़ाई, सब्र और अल्लाह के क़रीब होने का ज़रिया है। रमज़ान के रोज़े हर मुसलमान के लिए एक नेमत और बरकत का महीना हैं, जो तौबा, तक़वा और रहमत पाने का बेहतरीन मौक़ा प्रदान करते हैं।

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