Zakat – The Third Pillar of Islam

इस्लाम में ज़कात (زكاة) सिर्फ़ एक दान का काम नहीं, बल्कि यह अल्लाह तआला का फ़र्ज़ हुक्म और इस्लाम के पाँच स्तम्भों (Five Pillars of Islam) में से एक है Zakat – The Third Pillar of Islam.
ज़कात” का लफ़्ज़ अरबी में “पाक करना” और बढ़ाना के मानी में आता है। ज़कात एक फ़र्ज़ इबादत है, जिसे अल्लाह तआला ने हर मालदार मुसलमान पर वाजिब किया है, ताकि समाज में आर्थिक बराबरी कायम हो और ग़रीबों, ज़रूरतमंदों की मदद हो सके।

ज़कात अदा करने से इंसान का माल और दिल दोनों पाक हो जाते हैं। इसका मक़सद समाज में ग़रीबी मिटाना, अमीर-ग़रीब के बीच इन्साफ़ कायम करना और उम्मत में मोहब्बत बढ़ाना है।

📖 क़ुरआन का हुक्म:

“और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो, और जो भलाई तुम अपने लिए आगे भेजोगे, उसे अल्लाह के पास पाओगे।” (सूरह अल-बक़रह 2:110)

Zakat – The Third Pillar of Islam Meaning Importance and Benefits

ज़कात वह लाज़मी (फ़र्ज़) सदक़ा है जो हर मालदार और निसाब के मालिक मुसलमान पर साल में एक बार अदा करना वाजिब है।आम तौर पर यह 2.5% माल से निकाली जाती है, जो पूरा एक चाँद (हिजरी) साल आपके पास मौजूद रहा हो।

क़ुरआन करीम में 30 से ज़्यादा बार नमाज़ के साथ ज़कात का ज़िक्र आया है। यह दिखाता है कि अल्लाह के नज़दीक ज़कात की कितनी अहमियत है। ज़कात के मक़सद:

  1. अल्लाह के हुक्म की तामील (आज्ञा पालन)
  2. माल व दिल की पाकी
  3. ग़रीबों व ज़रूरतमंदों की मदद
  4. उम्मत में मोहब्बत व भाईचारा
  5. अमीरी-ग़रीबी का फ़र्क़ कम करना

अरबी:
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ (सूरह अल-बक़राह: 43)

हिंदी:
“नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो।”

Roman English:
Wa aqeemu as-salat wa aatuz-zakah. (Surah Al-Baqarah: 43)

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

अरबी:
ما من صاحب ذهب ولا فضة لا يؤدي منها حقها إلا إذا كان يوم القيامة صفحت له صفائح من نار (सहीह मुस्लिम)

हिंदी:
“जिसके पास सोना या चाँदी हो और वह उसकी ज़कात अदा न करे, क़ियामत के दिन उसके लिए आग की पट्टियाँ बनाई जाएंगी।”

रोमन इंग्लिश:
Ma min sahib dhahab wa la fiddah la yu’addi minha haqqaha illa idha kana yawm al-qiyamah suhfihat lahu suhfah min nar.

ज़कात हर ऐसे मुसलमान पर फ़र्ज़ है जो:

  1. बालिग़ और अक़्लमंद हो
  2. निसाब से ज़्यादा माल का मालिक हो
  3. उसका माल एक चाँद साल पूरा हो जाए
  4. माल की किस्में: सोना, चाँदी, नक़द, बचत, बिज़नेस का माल, खेती, मवेशी, निवेश इत्यादि

निसाब वह कम से कम माल की हद है जिसके ऊपर ज़कात वाजिब होती है।

  • सोने का निसाब: 87.48 ग्राम सोना
  • चाँदी का निसाब: 612.36 ग्राम चाँदी

(इसका रुपये में हिसाब मार्केट के रेट से होगा।)

  1. अपना पूरा ज़कात वाला माल लिखें – सोना, चाँदी, नक़द, बचत, बिज़नेस का स्टॉक, निवेश आदि
  2. क़र्ज़ या तुरंत देनी वाली ज़िम्मेदारियाँ घटा दें
  3. नेट (शुद्ध) माल निकालें
  4. अगर माल निसाब से ज़्यादा है, तो उसका 2.5% ज़कात निकालें

उदाहरण:
अगर आपके पास नेट बचत = ₹500,000 है और निसाब की क़ीमत = ₹87,000 है, तो ज़कात = ₹500,000 × 2.5% = ₹12,500

(सूरह अत-तौबा 9:60 के मुताबिक़)

  1. ग़रीब (फुक़रा)
  2. ज़रूरतमंद (मसाकीन)
  3. ज़कात इकट्ठा करने वाले अमिलीन
  4. नए मुसलमान (मुअल्लफ़तुल क़ुलूब)
  5. ग़ुलाम को आज़ाद कराने में
  6. क़र्ज़दार
  7. अल्लाह के रास्ते में (फ़ी सबीलिल्लाह)
  8. मुसाफ़िर जो मुसीबत में हो
  1. गरीबी का खात्मा – ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद होती है।
  2. दिल की पाकीज़गी – इंसान के दिल से लालच और बुख़्ल (कंजूसी) खत्म होती है।
  3. माल में बरकत – अल्लाह तआला माल में बरकत अता करते हैं।
  4. सामाजिक बराबरी – अमीर और गरीब में दूरी कम होती है।मुसाफ़िर जो मुसीबत में हो
  • ज़कात: फ़र्ज़, तयशुदा प्रतिशत, ख़ास नियमों के साथ देना होता है.
  • सदक़ा: नफ़्ल (इख़्तियारी), किसी भी वक़्त, किसी भी मात्रा में दे सकता है.
  • माल के कुछ हिस्से (जैसे निवेश, बिज़नेस का स्टॉक) को भूल जाना
  • वक़्त से देर से अदा करना
  • ग़ैर-हक़दार को देना
  • निसाब का सही हिसाब न लगाना

ज़कात सिर्फ़ पैसे देने का नाम नहीं — यह अल्लाह की इबादत है, जो माल को पाक करती है, ग़रीबों की मदद करती है और समाज को बेहतर बनाती है।
हर मुसलमान को चाहिए कि सालाना अपना माल हिसाब करके सही तरीक़े से ज़कात अदा करे, ताकि अल्लाह की रज़ामंदी और बरकत हासिल हो।

सवाल 1: क्या ज़कात फ़र्ज़ है?

जी हाँ, हर उस मुसलमान पर जो निसाब का मालिक है।

सवाल 2: क्या रिश्तेदारों को ज़कात दी जा सकती है?

हाँ, लेकिन माता-पिता, बच्चे और पत्नी को नहीं।

सवाल 3: ज़कात देने का सबसे अच्छा वक़्त कब है?

किसी भी हिजरी साल में, लेकिन रमज़ान में देने का सवाब ज़्यादा है।

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